कुंडलिनी उठाने के बाद
सर्व प्रथम आइये हम अपने आप को बंधन में लेते हैं। कुंडलिनी
को उठाएं, चित्त
सहस्त्रार पर रखें एवं आंखें बंद न करें। अपने
सिर को थोड़ा पीछे झुकाएं, सीधे बैठें, 1 - 2 और 3, (श्रीमाताजी ने 3 बार कुंडलिनी उठाई, एवं सहस्त्रार पर 3 बार में 1, 2 एवं 3 गठाने लगाई), अब बंधन लें- (श्रीमाताजी ने प्रारंभ किया बांई
ओर कुल्हे के स्तर से हाथ उपर लिया, शरीर के उपर सिर के उपर से दाहिने कुल्हे तक फिर इसी
रास्ते से वापस बांई तरफ जहां शुरू किया था वहां तक, शरीर के आसपास एक घेरा
बनाते हुए, इसे श्रीमाताजी ने 1 बंधन कहा है। इस बंधन का
आकार घोड़े की नाल की तरह होगा। व्यवस्थित
एवं सुचारू तरीके से 1,2,3 सभी व्यवस्थित करें जैसे मैं कर रही हूँ। 4, 5, एक दम आराम से आहिस्ता
आहिस्ता, 6
एवं 7
पूरे करें। अभी भी हमने ठीक नहीं किए हैं, इसे एक लय में करना चाहिए।
चलिए फिर से करते हैं। एक, दो - चित्त सहस्त्रार पर - 3, मैं जैसे कर रही हूँ
वैसे करें 4,
5 सुन्दर । चित्त
सहस्त्रार पर, 6
एवं 7।
इस बार श्रीमाताजी ने धीरे धीरे बंधन लिए।
अंतिम बार श्रीमाताजी ने
धीरे धीरे हाथ उठाया एवं बंधन पूरा किया।
हाँ, अब देखो अत्यधिक जोरदार चैतन्य लहरियां (04.05.85)
सभी परेशानियां एक बंधन
से सुलझ जाती हैं। यह कार्य होता है, परन्तु आपको परमात्मा से पूरी तरह से जुड़ा होना
चाहिए (24.12.95)। बंधन चैतन्य को कार्यान्वित करता है (08.08.89); बांई बाजू की समस्याओं
के लिए बंधन दें या स्वयं का नाम कागज पर लिख कर जलाएं (08.04.87);
प्रातः काल के समय अपने
आप को बंधन देना है। जब आप बाहर जाते हैं तब बिना बंधन लिए बाहर नहीं जाना है (21.09.88);
जब आप बंधन लेते हैं, तब वह कितने
समय रहता है यह आपकी बंधन लेने की दृढ़ता पर निर्भर करता है। कुछ समय पश्चात आपको बंधन लेने की आवश्यकता नहीं रह
जाती है। यदि आप कहीं भी बैठे हैं, उदाहरण के तौर पर किसी
संगीत कार्यक्रम में, और आप अचानक बंधन लेना प्रारंभ कर देते हैं, तो वह पागलपन
होगा। आप कुन्डलिनी उठाने की प्रक्रिया करते हैं, तो वह भी मूर्खता होगी। इस तरह नहीं
करना है। आपको गरिमामय ढंग से बैठना है और यह समझना एवं ध्यान रखना है कि लोग आपको
देख रहे हैं (24.12.87);
कबेला
में गुलाब ऐसे बड़े आकार के होते हैं.... आपको पूरे विश्व में इतने बड़े आकार के गुलाब नहीं मिलेंगे। लेकिन हमारे पास
यहां इतनी बड़ी संख्या में हैं। प्रतिष्ठान
में हमारे पास इतने बड़े सूरजमुखी थे
...
एक आदमी उसे उठा नहीं सकता था। अब यह सब कैसे होता है, यह सब कुछ विशेष जगह पर ही होता है। यह पृथ्वी माता जानती
है कि यहां कौन रह रहा है, इस जमीन पर
कौन चल रहा है। क्योंकि पृथ्वी माता
चैतन्य लहरियों को पहचानती हैं, उन्हें समझती हैं (25.05.97) ।
-जय श्री माताजी-