सत्य, परम वास्तविकता वह है, जो आपके मध्य नाड़ी संस्थान पर अनुभव किया जाना है (08.07.84); जिसे यदि प्रत्येक के लिए एक समान अनुभव किया जाता है, तो ही वह परम है (02.07.84)। वह जो ‘सापेक्ष’ नहीं है... जिसकी तुलना नहीं की जा सकती... किसी अन्य वस्तु से संबंधित नहीं किया जा सकता, समझा नहीं जा सकता, वही परम है। जिस भी तरीके से आप परम को जानने की कोशिश करते हैं... या विश्लेषण करने का प्रयास करते हैं... आप इससे दूर हैं; वह अवस्था जिसे अभी हमारे अंदर स्थापित किया जाना है; फिर, डर का क्या प्रश्न है... इसके बारे में बात करने का प्रश्न क्या है... आप यह नहीं कह सकते कि यह इस तरह है, या यह उस तरह है - परम का वर्णन करने के लिए कोई शब्द नहीं है... केवल नकारने से... यह नहीं... यह नहीं ...यह नहीं ...फिर जो बचता है, वह परम है। इस तरह से आप परम की अवस्था में पहुंच जाते हैं... और उस अवस्था में, एक पूर्ण संवाद स्थापित हो जाता है... और उस संवाद में परम के अलावा आपके अंदर और कुछ नहीं होता है। यह वह स्तर है जिसकी हमें आकांक्षा करनी चाहिए... वही उत्थान होना चाहिए। इसमें ‘कैसे होता है’ जैसा कुछ नहीं है... आप बस हो जाते हैं... जैसे एक फूल फल बन जाता है... यह सब आपके अंदर निर्मित हो जाता है। इसे क्रियान्वित होने दें। मात्र आत्म समर्पण से, आप बन जाते हैं... और आप अपनी संपूर्णता का आनंद प्राप्त करेंगे। शब्द बन्द हो जाते हैं... वर्णन रूक जाता है... आप बस संपूर्ण हो जाते हैं, और अपनी संपूर्णता का अनुभव करते हैं। यदि आपके साथ कोई नहीं हैं, तो आप चिंता न करें... वहां किसी ‘साथ’ की आवश्यकता नहीं है... आप अकेले हैं... संपूर्णता का आनंद ले रहे हैं। इसके बाद ही आप दूसरों में भी संपूर्णता का आनंद ले सकते हैं (05.05.85)।
आत्म साक्षात्कार यह है कि आप परम के साथ ‘एकाकार’ हो जाते हैं... आप संपूर्णता को जानते हैं... एक बार आप संपूर्णता को जान लेते हैं, तभी आप सापेक्ष को भी जान सकते हैं। जब तक आप परम को नहीं जान लेते, तब तक आप भ्रम में हैं... क्योंकि सब कुछ सापेक्ष है... और इसलिए कोई नहीं जानता कि वास्तव में क्या सही है, और क्या नहीं है। तो आपके पास ‘परम बिंदु’ होना चाहिए... जैसे, कि आपके पास पेरिस में ‘एक मीटर’ है, जो एक निश्चित मात्रा है... इसलिए जब आप कहते हैं, कि यह दस मीटर है, तो यह उस मीटर का दस गुना है, जो पेरिस में है। किन्तु, क्योंकि हमने अपना परम नहीं पाया है, इसलिए हम असमंजस में हैं... और इसलिए पहली बात यह है, कि हमें अपना परम प्राप्त होना चाहिए... और परम आत्मा है (09.10.79.1)।
-जय श्री माताजी - v1